मरावती का शेंदुरजना गांव :
“वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. लेकिन जब उसकी शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गई. कुछ नहीं तो मेहमानों को सादा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी? मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”
यवतमाल का पिपरी बुट्टी गांव :
“सब जगह ढूंढा पर मां नहीं मिलीं...फिर गांव के बाहर के कुएं पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुएं के बाहर पड़ी थी.
खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे, मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ. फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
यवतमाल का ही वागधा गांव:
“कागज़ों पर हमारा कर्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार कर्ज़ था. जिन माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों से हमने कर्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़, हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद माँ बच जाती”.
दोनों ही बार मुझे अंदाज़ा नहीं हुआ कि मेरी बेटियां ऐसा कुछ कर करने
वाली हैं. खेती के लिए हमें कर्ज़ा लेना पड़ा था. कर्ज़ा चुकाने को लेकर
तनाव भी रहता है. लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि वह इतना बड़ा कदम उठा
लेंगी”.
बेटियों की फ़्रेम करवाई हुई तस्वीरें गोद में लिए बैठी देवकू के गमगीन चेहरे पर रसोई की खिड़की से गिरती धूप पड़ रही थी.
“बड़ी वाली उस दिन बिल्कुल सामान्य थी. उसने सुबह उठकर घर की सफ़ाई की. खाना बनाया. फिर बाल धोकर नहाई और खाना खाया. इसके बाद अचानक शाम के 4 बजे उसने ज़हर (कीटनाशक) खा लिया. तीन महीने के अंदर ही छोटी वाली ने भी ज़हर (कीटनाशक) पी लिया. वह भी पूरे दिन ठीक थी. शाम को टहलने छत पर गयी थी. वहीं उसने ज़हर पी लिया”
कहते कहते देवकू रुआंसी होकर दीवार को देखने लगती हैं.
“वो लड़की नहीं, लड़का थी मेरा! खेती में कंधे से कंधा मिलाकर मेरा साथ देती. लेकिन जब उसकी शादी करनी थी, तभी सारी फ़सल ख़राब हो गई. कुछ नहीं तो मेहमानों को सादा भोजन करवाकर बेटी को एक जोड़ी कपड़ों में तो विदा करना ही था. इतने भी पैसे नहीं बनते थे. कहां से करते शादी? मेरी बच्चियाँ सब सुनती थीं पर कभी हमें एहसास नहीं होने दिया कि वो परेशान हैं. बस एक दिन अचानक चली गयीं”
यवतमाल का पिपरी बुट्टी गांव :
“सब जगह ढूंढा पर मां नहीं मिलीं...फिर गांव के बाहर के कुएं पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुएं के बाहर पड़ी थी.
खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे, मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ. फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
यवतमाल का ही वागधा गांव:
“कागज़ों पर हमारा कर्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार कर्ज़ था. जिन माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों से हमने कर्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़, हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद माँ बच जाती”.
राजधानी दिल्ली से लगभग 1200
किलोमीटर दूर स्थित महाराष्ट्र का अमरावती जिला बीच मानसून की हल्की
फुहारों में भीगा हुआ है. चौड़ी सड़कें, चौतरफ़ा हरियाली और राज्य के
विदर्भ इलाक़े में पड़ने वाले इस जिले का इंद्रधनुषीय आकाश आपके आसपास
ख़ुशहाली का भ्रम रचता है.
लेकिन टीक के पेड़ों और काली मिट्टी के खेतों से सजे यह ख़ूबसूरत रास्ते विदर्भ के जिन गांवों तक जाते हैं, वहां अवसाद और दुख के सिवा कुछ नहीं है. पर विदर्भ के इस दुख के कारणों और इससे जुड़े आंकड़ों में जाने से पहले आइए आप को ले चलते हैं जिले की तिवसा तहसील में बसे शेंदुरजना गांव.
इस गांव में रहने वाले भास्कर और देवकू राव असोडे का घर ढूँढने के लिए हमें ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता. गांव का हर बाशिंदा उस किसान के बारे में जानता था, जिसकी 2 जवान बेटियों ने हाल ही में बढ़ते क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली थी.
लेकिन टीक के पेड़ों और काली मिट्टी के खेतों से सजे यह ख़ूबसूरत रास्ते विदर्भ के जिन गांवों तक जाते हैं, वहां अवसाद और दुख के सिवा कुछ नहीं है. पर विदर्भ के इस दुख के कारणों और इससे जुड़े आंकड़ों में जाने से पहले आइए आप को ले चलते हैं जिले की तिवसा तहसील में बसे शेंदुरजना गांव.
इस गांव में रहने वाले भास्कर और देवकू राव असोडे का घर ढूँढने के लिए हमें ज़्यादा भटकना नहीं पड़ता. गांव का हर बाशिंदा उस किसान के बारे में जानता था, जिसकी 2 जवान बेटियों ने हाल ही में बढ़ते क़र्ज़ के चलते आत्महत्या कर ली थी.
ज़्यादातर पुरुष किसानों की
आत्महत्याओं के दस्तावेज़ों से अटी विदर्भ के कृषि विभाग की फ़ाइलों में
दर्ज 24 वर्षीय माधुरी और 21 वर्षीय स्वाति की यह कहानी राज्य की ‘किसान
बेटियों’ के हिस्से आने वाले संघर्षों की दास्तान है.
कीचड़ भरी एक अंधेरी गली पार करके हम हरी दीवारों वाले एक ऐसे घर के सामने पहुंचते हैं, जिसके मुख्य दरवाज़े पर बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का एक विशाल पोस्टर चिपका हुआ है.
भीतर दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात 45 वर्षीय देवकू असोडे से होती है. नारंगी रंग की मटमैली साड़ी पहने अपनी रसोई में बैठी देवकू सब्ज़ी काट रही थीं. हमें देखते ही उन्होंने रोना शुरू कर दिया. एक ग्लास पानी पीने और 5 मिनट की ख़ामोशी के बाद देवकू ने हल्की आवाज़ में बोलना शुरू किया.
कीचड़ भरी एक अंधेरी गली पार करके हम हरी दीवारों वाले एक ऐसे घर के सामने पहुंचते हैं, जिसके मुख्य दरवाज़े पर बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का एक विशाल पोस्टर चिपका हुआ है.
भीतर दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात 45 वर्षीय देवकू असोडे से होती है. नारंगी रंग की मटमैली साड़ी पहने अपनी रसोई में बैठी देवकू सब्ज़ी काट रही थीं. हमें देखते ही उन्होंने रोना शुरू कर दिया. एक ग्लास पानी पीने और 5 मिनट की ख़ामोशी के बाद देवकू ने हल्की आवाज़ में बोलना शुरू किया.
“बड़ी वाली उस दिन बिल्कुल सामान्य थी. उसने सुबह उठकर घर की सफ़ाई की. खाना बनाया. फिर बाल धोकर नहाई और खाना खाया. इसके बाद अचानक शाम के 4 बजे उसने ज़हर (कीटनाशक) खा लिया. तीन महीने के अंदर ही छोटी वाली ने भी ज़हर (कीटनाशक) पी लिया. वह भी पूरे दिन ठीक थी. शाम को टहलने छत पर गयी थी. वहीं उसने ज़हर पी लिया”
कहते कहते देवकू रुआंसी होकर दीवार को देखने लगती हैं.