Tuesday, September 11, 2018

科学研究显示:温室效应将高于预期

据《路透社》报道,新分析技术探明,大气中的一重要成分三氟化氮的含量是先前认为的四倍。大气中约含有5,400吨三氟化氮,并且每年以11%的速度增加。

三氟化氮是一种无色、无味、不可燃的气体,常被用于激光技术中。加利福尼亚州斯克普里斯海洋研究所的瑞·维斯称,以前的科技是无法精确测量大气中三氟化氮的含量的。

三氟化氮导致全球气温升高的速度是等量二氧化碳的17,000倍。由于使用频率较低,三氟化氮尚未成为导致全球变暖的主要因素。科学家在2006年预测其含量低于1,200吨。

维斯表示,如同对待二氧化碳一样,三氟化氮的排量需要受到控制。他说:“从气候变化因素考虑,把三氟化氮列为温室气体是很有必要的。我们需要按照《京都协议书》的规定对其生产编制清单,并限制排放,这样才能推动合理使用三氟化氮。”
据《卫报》报道,欧盟敦促中国和印度接受它所主张的后《京都议定书》协议,承担减排义务。

欧盟各国环境部长要求这两个发展中国家接受即将达成的后《京都议定书》气候协议,在2013年后,继续将15%-30%作为目标进行减排。欧盟提出的新协议并没有安排强制的减排义务,但是要求这些国家必须放缓由经济发展带来的排放量的增长,并保证促进全世界到2050年将温室气体的排放量在1990年的基础上减少至少50%。

《京都议定书》规定发达国家对全球变暖承担强制性减排义务,发展中国家不承担有法律约束力的温室气体限控义务,并被允许发展经济。

欧盟的这一政策主张是为今年12月初将在波兰波兹南召开的联合国环境变化会议服务的。该会议将为明年年底在哥本哈根召开的会议做准备,届时将制定后《京都议定书》。
中国科学院和其他几家研究机构的研究表明,未来二十年内中国温室气体排量将至少翻一番。如果不进行大规模控制,温室气体的排量将大大超出预期。

这项名为《中国能源报告》的研究显示,在不同的发展速度和科技进步情景下,中国在2020年前每年的二氧化碳排放量可达到25亿至29亿吨纯碳。截至2030年,二氧化碳年排放量可能达到31亿至40亿吨。

报告没有给出中国目前的温室气体排放量的数据,但是美国能源部的数据显示中国2004年的二氧化碳排放量为14亿吨。

去年据中国政府的一项估计,截至2050年,中国温室气体排放总量中的碳排放量可能达到每年20亿吨。
据《路透社》报道,德国内阁批准了环境部的建议,调低了2009年生物燃料添加比例,从6.25%降到5.25%。

从2010年到2014年,添加比例将重新被提高到6.25%,政府将于2011年对生物燃料生产的可持续性问题进行重新评估。

内阁同时决定从2009年1月起对生物燃料的税率从原定的21欧分(25美分)每公升降到18欧分(21美分)每公升。此前,德国生物燃料产业表示,对绿色燃料增税减少了销售额。

近几个月一些欧洲国家因担心生物燃料的生产会导致粮食价格上涨,从而降低了生物燃料添加目标。德国在今年上半年也取消了对某些汽油进行生物添加的要求,这主要是担心会损害旧车的发动机。

Tuesday, September 4, 2018

नजरिया: 'कट्टर राष्ट्रवाद की धुन में मोदी पूजा में लगा मीडिया'

रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में मीडिया का कोई भी मूल्यांकन ये मान कर शुरू होता है कि मोदी को मीडिया ने बनाया है. नरेंद्र मोदी को अकेले आरएसएस नहीं बना सकता था.
मीडिया ही था, जिसने सपने दिखाए और कहानियाँ सुनाईं. अमरीकी कॉमिक्स के प्रमुख किरदार रोशैख़ (जो अपराध से लड़ता है और दोषियों को हर हाल में सज़ा देता है) की तरह, जिससे लोगों को लगने लगा कि कांग्रेस में अब कुछ नहीं बचा है और उसका विकल्प केवल मोदी ही हैं.
इसने एक ऐसे व्यक्ति की रूपरेखा तैयार की, जो सक्रिय, साहसी, निर्णायक, सक्षम और कठोर था. वो एक 'इंप्रेशनिस्ट पेंटर' की तरह धीरे-धीरे उनकी एक जीवंत तस्वीर बनाते गए.
मोदी दो दशकों पहले पूरी तरह एक अफ़वाह थे, धीरे-धीरे चर्चाओं का हिस्सा बन गए और फिर मीडिया की रिपोर्टों ने पहले उनकी एक छवि बनाई. फिर उन्हें एक आइकन या आदर्श में बदल दिया. नरेंद्र मोदी मीडिया की एक बहुत बड़ी खोज हैं.
मीडिया का मोदी से क्या संबंध है, इस सवाल को दूसरी तरह से पूछने की जरूरत है.
सवाल ये है कि मीडिया अपनी ही बनाई कृति को कैसे देखता है, जो अब प्रधानमंत्री बन चुकी है. इसका जवाब काफी चिंताजनक है. लोग मीडिया से आलोचक, तथ्यात्मक और कम से कम संतुलित होने की उम्मीद तो करते हैं.
लेकिन अफ़सोस है कि मीडिया मोदी का बहुत बड़ा फ़ैन है. मीडिया ने खुद के भीतर झांकना ही छोड़ दिया है. जहां मीडिया को लोगों तक सच पहुंचाना चाहिए था और आलोचक की भूमिका निभानी चाहिए थी वहीं वो मोदी के कट्टर राष्ट्रवाद की धुन में व्यक्ति पूजा करने लगा है.
अख़बारों में मोदी पर छपी रिपोर्ट और विज्ञापन एक जैसे ही लगते हैं. इससे लगता है कि मोदी भारत के किम इल संग बन गए हैं, जो उत्तर कोरिया के पहले सर्वोच्च नेता थे. ऐसे नेता जिनसे कोई सवाल नहीं किया जाता.
शुरुआत में किसी को भी नरेंद्र मोदी से सहानुभूति हो सकती है क्योंकि मीडिया ने उन्हें एक ऐसे शख़्स के तौर पर दिखाया है, जो बाहरी और एक साधारण चाय वाला होने के बावजूद भी दिल्ली के लुटियंस किले में दाखिल हुआ.
अब इस काल्पनिक कहानी का आकर्षण बनाए रखने के लिए इन बातों पर बार-बार ज़ोर दिया जाता है.
मीडिया विरोधाभासी तरीक़े से दोनों बातें कहता है, एक तरफ़ तो वो कहता है कि मोदी तो नए हैं, इसलिए उनका स्वागत करो, दूसरी तरफ़ वो उन्हें वक्त की पुकार बताता है. सा लगता है जैसे 2019 के चुनावों की घोषणा हो चुकी है. ये हालात अमित शाह को तो ख़ुश कर सकते हैं लेकिन मीडिया की संदेह और आलोचन करने और उसकी जांच करने की भूमिका को पूरा नहीं करते हैं.
मीडिया इस तरह व्यवहार करता है जैसे देश में मोदी के सिवा कुछ है ही नहीं. बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाने वालीं ये ख़बरें मीडिया पर सवाल उठाती हैं और उसके विश्लेषण पर संदेह पैदा करती हैं.
इस बात को साबित करने के लिए तीन-चार मामलों पर गौर करते हैं. पहला मामला निश्चित तौर पर नोटबंदी से जुड़ा है. मीडिया ने इसे भारत में मनाए जा रहे एक त्यौहार की तरह दिखाया.
हो सकता है कि मध्यम वर्ग ने शुरुआत में इसे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई समझते हुए ख़ुशी मनाई हो. लेकिन, जल्द ही ये हक़ीक़त उनके सामने आ गई कि नोटबंदी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और नगदी की ज़रूरत वाले धंधों के ख़िलाफ़ एक लड़ाई थी.
मीडिया लोगों की परेशानी को अनदेखा करता रहा है. नोटबंदी नाम के इस त्यौहार में मीडिया ने इन व्यापक दिक्कतों के सामने अपनी आँख बंद रखी.
दूसरा, अगर मीडिया उस वक्त तुरंत नोटबंदी के नुकसान को न देख पाया हो तो भी वह कम से कम लंबे कुछ वक्त बीतने के बाद तो इसका सटीक विश्लेषण कर ही सकता था. लेकिन विश्लेषण में की गई ये बेईमानी इसकी रिपोर्टिंग की अवास्तविकता को दिखाती है. ब विदेश नीति पर गौर करते हैं. नरेंद्र मोदी शिंजो आबे, व्लादीमिर पुतिन या डोनल्ड ट्रंप के साथ खड़े होकर एक बेहद आकर्षक दृश्य पैदा करते हैं और सभी को मोह लेते हैं. मीडिया भी इसमें भरपूर सहयोग देता है.
लेकिन, इस दौरान मीडिया इन चार देशों के नैतिक ख़ालीपन को देखना भूल जाता है.
नरेंद्र मोदी यमन, सीरिया और रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर चुप्पी साधे रहते हैं. एशिया को लेकर उनका विचार तय है. फिर भी मीडिया इसराइली नीति पर सवाल पूछे बिना इसराइल के मामले में मोदी के सहयोगी की भूमिका निभाता है. रक्षा सौदों में इसराइल की भागीदारी का स्वागत करता है.
इस तरह अपनी रक्षा पर ज़ोर देने वाले भारत को मीडिया और मध्यम वर्ग की तारीफ़ मिलती है.
अगर गौर करें तो मोदी ने चीन के मामले में तिब्बत को धमकाने और शर्मिंदा करने के अलावा ज़्यादा कुछ नहीं किया है. बस पाकिस्तान के मामले में थोड़ा बहुत कुछ हासिल किया है. किन मीडिया विदेश नी​ति पर गंभीर नहीं दिखता है. इस मामले में मोदी का वास्तविक आकलन बहुत कम होता है. मीडिया के पास बहुत कम संदेह और सवाल हैं.
हम पाकिस्तान और चीन पर ख्याली जीत की खुशी मनाते हैं. जहां मीडिया वास्तविकता दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था वहां, वो जी-हुज़ूरी में लगा है और लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से धोखा कर रहा है.
'मॉब लिंचिंग' को लेकर मोदी के रवैए पर मीडिया का नज़रिया और अधिक शर्मिंदा करता है. मीडिया मोदी की प्रतिक्रिया को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश करता है. मीडिया के पास कोई अलग नज़रिया न होना वाकई चिंता पैदा करता है. वो शख़्स जिसने कांग्रेस से कई जवाब मांगे हों वो अब घटनाओं पर न के बराबर ही प्रतिक्रियाएं दे रहा है. इस पर सवाल तो उठता ही है.
नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों और कमज़ोरियों को लेकर मीडिया के ढुलमुल रवैए के कारण ये पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि विज्ञापन कहां ख़त्म होता है और मोदी का संतुलित मूल्यांकन कहां से शुरू होता है.
यहां तक कि मीडिया असम को लेकर भी चुप है और बस कुछ छुट-पुट विश्लेषण किए जा रहे हैं. यह नागरिक रजिस्टर को भारत की एक महान परंपरा की तरह दिखा रहा है.
इन पूरे हालातों के बीच देश में विरोध और मतभेद के लिए जगह बहुत कम रह जाती है.
उम्मीद है कि मीडिया बहुसंख्यकवाद की उंगलियों पर नाचने की बजाए अपनी असली भूमिका में लौटेगा.
मीडिया ने आपातकाल में एक अलग ही भूमिका निभाई थी. उम्मीद है कि मीडिया साल 2019 के चुनावों से पहले आलोचना और साहस की पत्रकारिता पर फिर से लौटेगा.
यह विरोध और लोकतंत्र का मीडिया पर एक कर्ज है.

Saturday, September 1, 2018

中国与欧盟争夺拉美市场

近日来,正当中国投资非洲国家这一话题备受关注时,国际环境与发展协会新发布的一项报告显示,另一场剧目正在拉丁美洲拉开帷幕。

报告称中国将赶超欧盟,成为拉美国家仅次于美国的第二大贸易合作伙伴。

从中外对话以往对这一问题的报道不难看出,此问题备受关注并非毫无缘由。特别是在秘鲁,中国企业因未以适当的方式与当地团体进行沟通商议,从而导致了双方一系列的矛盾,比如首钢矿业开发集团与当地矿工的冲突事件。

然而,国际环境与发展协会通过在智利、巴西及秘鲁的调查,发现有迹象表明中国企业“正在从以往对外投资的失误中吸取教训”。

报告指出,在中国与拉美国家的贸易合作中,国有企业占主导地位,例如2012年中国在巴西投资总额的93%都来自国有企业。

然而,目前例如“赤道原则”等一些旨在判断、评估和管理项目融资中环境与社会风险的国际准则,却未得到中国政府及各大银行的关注。

在对中国许多现有指引方针提出批评的同时,报告也肯定了中国还有其他“既符合当前国际准则,又适宜于中国国情”的方针。中国现有的指引方针,例如由商务部制订的一些准则,并未在“被投资国的环境法律之外”提供其他解决可持续发展相关问题的指导。

报告所肯定的方针之一就是《绿色信贷指引》。这一指引是由在拉美国家的重点投资商——中国国家开发银行制订的。报告的第一作者艾玛·布莱克默称这些指引条例将用于判断某项投资在可持续发展方面是否具有可行性,而且这些条例可能在“构建中国境内外投资的本质上发挥日益重要的作用”。

国际环境与发展协会发布的报告同样指出,被投资国的立法及执法状况也在很大程度上决定着中国企业在该国的行为准则。

巴西和智利虽从未吹嘘过本国在促进可持续发展方面是如何与中国企业进行完美合作的,但报告却显示了两国在这方面的立法和执法要优于秘鲁。

特别是在巴西,中国投资商因不得不与当地企业合作而必须遵守当地企业制订出的相对严格完备的可持续发展规定。根据报告,秘鲁在接受投资时对其类型规定较为宽松,因而作者认为,这也纵容了中国企业在秘鲁运作时忽略可持续发展的问题。

报告中还提到,秘鲁政府对于中国投资商的关注焦点更多地在于“鼓励投资而非管控、了解中国企业,或敦促本土企业为新矿业公司的入驻做准备”。

此外,报告作者们还质疑:像在秘鲁这样的国家,立法机关承担着立法和吸引中方投资的双重职责,究竟应该先考虑哪一项?